प्राचीन मंदिर और वास्तुकला का चमत्कार
भोजपुर मंदिर, जिसे भोजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है, मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित है। इसका निर्माण 11वीं शताब्दी में महान परमार राजा भोज (1010-1055 ई.) द्वारा किया गया था। राजा भोज न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि कला, विज्ञान और साहित्य के बहुत बड़े संरक्षक भी थे। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और अपनी विशालता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इसे 'पूर्व का सोमनाथ' भी कहा जाता है।
भोजपुर की स्थापना 11वीं सदी में राजा भोज ने की थी। भोपाल का मूल नाम 'भोजपाल' माना जाता है (भोज = राजा भोज, पाल = बांध)। राजा भोज ने यहाँ एक विशाल तालाब बनवाया था और उसे रोकने के लिए एक 'पाल' (बांध) बनाया था, इसलिए इसका नाम भोजपाल पड़ा, जो बाद में बिगड़कर भोपाल हो गया।
भोजपुर अपनी पहचान भोजेश्वर महादेव मंदिर के लिए रखता है। यह मंदिर आज भी अधूरा है। इसकी छत पूरी नहीं बनी है और मंदिर के निर्माण के लिए लाए गए बड़े पत्थर आज भी वहीं पास में पड़े हैं। यह अधूरा क्यों रह गया, इसके पीछे कई कहानियाँ हैं (जैसे युद्ध शुरू हो जाना या वास्तु दोष), लेकिन कोई ठोस प्रमाण नहीं है।
राजा भोज ने भोजपुर में बेतवा नदी के पास दो पहाड़ियों को जोड़कर एक विशाल बांध बनवाया था। इतिहासकारों के अनुसार, 15वीं सदी में मांडू के सुल्तान होशंग शाह ने इस बांध को तुड़वा दिया था, जिससे झील का पानी खाली हो गया और वह इलाका खेती योग्य जमीन बन गया (आज का मंडीदीप क्षेत्र)।
भोजपुर दुनिया की उन दुर्लभ जगहों में से एक है जहाँ मंदिर के निर्माण के नक्शे (Blueprints) पत्थरों पर खुदे हुए मिले हैं। इससे पता चलता है कि 1000 साल पहले भी भारतीय इंजीनियर और वास्तुकार पहले ड्राइंग बनाते थे और फिर निर्माण करते थे।

यह मंदिर एक विशाल चबूतरे पर टिका है। इसके गर्भगृह में स्थित शिवलिंग की ऊंचाई 18 फीट है, जो एक ही पत्थर से बना है। मंदिर की छत को विशाल नक्काशीदार खंभों ने सहारा दिया हुआ है।

शिव मंदिर के पास ही एक अधूरा जैन मंदिर भी है। इसमें भगवान शांतिनाथ की 20 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा है। यहाँ की शांति आपका मन मोह लेगी।