सिख धर्म और शहादत की पवित्र भूमि
स्वर्ण मंदिर (श्री हरिमंदिर साहिब) सिख धर्म का सबसे पवित्र धार्मिक स्थल है। यह केवल एक गुरुद्वारा नहीं, बल्कि मानवता और समानता का प्रतीक है। इसका निर्माण सिखों के पांचवें गुरु, गुरु अर्जन देव जी ने शुरू करवाया था। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता का संदेश देने के लिए 1588 ई. में लाहौर के सूफी संत साईं मियां मीर से इसकी नींव रखवाई थी।
मंदिर के चार दरवाजे हैं जो यह दर्शाते हैं कि यह हर धर्म और जाति के लिए खुला है। 19वीं सदी में महाराजा रणजीत सिंह ने इसके ऊपरी हिस्से को संगमरमर और सोने की परत से ढकवाया, जिसके बाद इसे 'स्वर्ण मंदिर' कहा जाने लगा।
मंदिर एक पवित्र सरोवर (अमृत सरोवर) के बीच में स्थित है। मंदिर के ठीक सामने श्री अकाल तख्त साहिब है, जो सिखों की सर्वोच्च संस्था और न्याय का प्रतीक है।

सिख धर्म का सबसे पवित्र तीर्थस्थल। यहाँ का शांत वातावरण और लंगर सेवा अद्वितीय है। इसे 'दरबार साहिब' भी कहा जाता है।

स्वर्ण मंदिर के पास स्थित यह बाग 1919 के नरसंहार की याद दिलाता है। यहाँ की दीवारों पर गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं जो शहीदों की कुर्बानी बयां करते हैं।

भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित। यहाँ हर शाम होने वाली 'बीटिंग रिट्रीट' सेरेमनी देशभक्ति का एक अद्भुत प्रदर्शन है।